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Suresh Patwa

सुरेश पटवा
अध्ययन और पर्यटन के शौकीन सुरेश पटवा, भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक और मध्यांचल ग्रामीण बैंक में महाप्रबंधक पद से सेवा निवृत्त हैं। वर्तमान में पूर्णकालिक साहित्य सृजन में व्यस्त हैं।
आप बहुविध लेखन के लिये विख्यात हैं। कविता, ग़ज़ल, गीत, लघुकथा, कहानी, उपन्यास, यात्रा वृतांत, संस्मरण, व्यंग्य, वांग्मय और आध्यात्मिक विषयों पर निरंतर लेखन कर रहे हैं। आपकी विभिन्न विषयों पर 20 से अधिक किताबें प्रकाशित हैं। जिनसे इन्हें चालीस से पचास हजार रुपयों की रॉयल्टी हर साल मिलती है।
इनका एक उपन्यास ‘दास्तान ए मिर्ज़ा गालिब’ और अध्यात्म पर ‘वेदों से वेदान्त’ प्रसिद्ध प्रकाशक ‘किताब घर प्रकाशन’ दिल्ली से प्रकाशित हो रहे हैं।
आप वर्तमान में ऐतिहासिक पुस्तक ‘आजादी का बँटवारा’, ‘वेदान्त से वैराग्य’, एक यथार्थवादी उपन्यास ‘यूनियन’ और एकऔर उपन्यास ‘आदि शंकराचार्य’ पर काम कर रहे हैं। आपके द्वारा भोजपाल साहित्य संस्थान के सानिध्य में संपादित व्यंग्य संकलन ‘जात-कुजात’ शीघ्र आपके हाथों में होगा। सुरेश पटवा समाज के प्रत्येक दुख, अभाव और आनंद उनके हृदय में वेदना पैदा करते हैं। अनुभूति की गहराइयां उन्हें प्रत्येक स्थिति में कलम चलाने को विवश करती है, इसीलिए उनका यह काव्य संग्रह विषय वैविध्य से परिपूर्ण है। गीत गजल जैसी अनुशासित विधा पर लेखनी चलाने वाले सुरेश पटवा जी मुक्त छंद में भी उसी सहजता के साथ अभिव्यक्त होते हैं। सहजता और सरलता उनकी कविता की विशेषता है। सरल शब्दों में व्यक्त की गई भावनाएं पाठकों तक सरलता से पहुंच जाती हैं। सरल होना एक कठिन कार्य है, जबकि कठिन होना सरल। सरल होने का कठिन कार्य पटवा जी ने किया है। एक ओर वे जीव विज्ञान की विस्तृत समझ रखते हैं, वहीं दूसरी ओर अध्यात्म से भी उनका गहरा नाता है।
वे जीवन के जटिल विषयों पर लेखन करते हैं, नर्मदा यात्रा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर भी लेखन करते हैं। कुल मिलाकर सभी विषयों पर समान अधिकार रखते हैं। विषय वैविध्य, विचार वैविध्य, विधा वैविध्य को अपने ज्ञान वैविध्य से साधते हैं। संग्रह की कविताएं समाज का मुखपत्र हैं। एक संवेदनशील मन जो अपना सामाजिक दायित्व निर्वहन करते हुए मुखरता से जो कुछ कहना चाहिए वह सब अपनी कविताओं में कहते हैं, किंतु इस कहन की विशेषता यह है कि उसे कहते हुए वह अपनी करुणा या दुख का प्रदर्शन नहीं करते, उनकी कविताएं रोती चीखती चिल्लाती नहीं है, वरन दृढ़ता के साथ शिकायती लहजे में अपनी बात कहती है। ये शिकायती कविताएं जिम्मेदारों पर तंज भी करती है उलहाने भी देती है और चेतावनी देने के साथ सावधान भी करती हैं। कविता का यही धर्म है और सुरेश पटवा जी का ये काव्य संग्रह उस धर्म का बखूबी पालन करता है। इस संग्रह की रचनाएँ पाठकों को नागरिक जिÞम्मेदारी का अहसास कराने की क्षमता रखती हैं।

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