किताबों में आकर्षण होता है, किताबों का जादू अच्छे पाठक के सिर चढ़ कर बोलता है। किताबें अपने पाठक को स्वयं अपनी तरफ खींचने की ताकत रखती है। किंतु शर्त ये है कि पाठक असली हो, जो किताबों से इश्क करता हो। किताबों की पहचान रखता हो। कल समदर्शी प्रकाशन के ऑफिस में वरिष्ठ साहित्यकार, राम गोपाल भारतीय जी आए। प्रकाशन का दफ्तर तो पुस्तकें हर तरफ थी हीं। उन्होंने सामने रखी पुस्तक में से एकपुस्तक उठाई और उसे उलट पलट कर देखा। बोले – वाह योगेश जी क्या सुंदर छपाई है और उससे भी अधिक सुंदर अंदर की कविताएं। ये कहते हुए उन्होंने 100 रुपये का नोट मेरी तरफ बढ़ाया और बोले लीजिए योगेश जी ये पुस्तक मैं खरीद रहा हूँ। मुझे बहुत अच्छी लगी ये पुस्तक, इसके लेखक श्री सत्यवीर नाहडिया जी को मेरी तरफ से शुभकामनाएँ प्रेषित अवश्य कीजिएगा।
मैं अभिभूत था, बहुत से कवि साहित्यकार ऑफिस आते हैं, अनेक लेखक आते हैं, जो अपनी पुस्तकें प्रकाशित करने के फेर में हैं किंतु पहले से प्रकाशित पुस्तकों के प्रति उनका न तो कोई आकषर्ण होता है न ही सरोकार। जब तक साहित्य के क्षेत्र से जुडे लोग इस जीवटता के साथ पुस्तकों को खरीद कर लेने की नीयत नहीं बनाएँगे तब तक साहित्य का वर्धन कैसे होगा।
कई तो ऑफिस में आते हैं, पुस्तकें उलटते पलटते हैं और किसी पुस्तक को उठा कर पूछ भी बैठते हैं योगेश जी ये पुस्तक बहुत अच्छी लग रही है क्या मैं इसे ले लूँ। ऐसे में मुझ जैसा व्यक्ति संकोच में क्या कहेगा, पैसे तो नहीं माँगूंगा। किंतु भारतीय जी जैसे सच्चे सहित्यकार किताब की महत्ता के साथ साथ किताब का मूल्य समझते भी हैं और चुकाते भी हैं। किताबों का आकर्षण और चुम्बकत्व अभी जिंदा है, किंतु चुम्बक जैसे लोहे को ही खींचती है किताबें आज भी सच्चे पाठक को ही खींच पाने में सक्षम है। पाठक होना और अपने आप को पाठक बताना जताना ये भी अलग अलग बात है।
वास्तव में रामगोपाल भारतीय जी के इस व्यवहार ने दिल छू लिया। प्रणाम आदरणीय को।


पुस्तक चाहत कम नहीं हुई, पुस्तक खरीदने की ललक कम हुई है। इसीलिए पुस्तक मेलो की आवश्यक्ता महसूस हुई । प्रेम बना रहे।
वास्तव में पुस्तकों के पन्नों की महक कोई कोई विरला ही महसूस कर सकता है।
विनय मोहन खार वन,
जगाधरी, हरियाणा